Vineetchhajer

Dreamer in me.. Seeking Answers!! Believer in me.. Finding them!! :)

अक्स by Lalit Kundalia!

on February 16, 2012

 

 

 

 

 

 

 

 

टूट चुका था सदियों पेहले, तुझसे वो रिश्ता मेरा
बंद आँखों में ना जाने फिर भी क्यूँ नज़र आता हैं चेहरा तेरा

तेरी आहटों के साथ बितायी हैं ये ज़िन्दगी मैंने
अनगिनत आँसु दिए हैं मैंने अपने अश्रु से बेहने

कोई महसूस नहीं कर सकता, दिया है तुमने जो ज़ख्म ये गेहरा
आज भी जिंदा हैं कहीं मुझमे छिपा अक्स वो तेरा 

तेरी यादों ने बरपाया हैं मुझपे वो कहर
मीठी थी जो ज़िन्दगी कभी, अब लगती हे ज़हर

पर अब नहीं है उन रास्तों से मेरा कोई वास्ता
अब अलग हे मंजिल मेरी, अलग हे मेरा रास्ता

तनहाइयों की इन बेड़ियों को में अब तोड़ दूंगा
गुमनामी के इस मंज़र से में अपना मूह मोड़ लूँगा

अब एक ही लक्ष्य हैं जीवन का, की ऊँचाइयों को पाना हैं…
नामुमकिन कुछ भी नहीं, ये साबित कर दिखाना हैं….!

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2 responses to “अक्स by Lalit Kundalia!

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